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सुंदर और स्मार्ट दिखने की बढ़ती होड के कारण महिलाओं में विशेष मछलियों के जरिए स्पा एवं पेडिक्योर कराने का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है लेकिन इसके कारण गंभीर बीमारियां एवं संक्रमण फैल रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि फिश पेडिक्योर के कारण एड्स, एचआईवी, सोरायसिस, एक्जीमा एवं अन्य त्वचा रोग फैल रहे हैं। एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एआईएमएस) के वरिष्ठ त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित बांगिया कहते हैं ये मछलियां खुद कई तरह के जीवाणुओं एवं बीमारियों को फैलाती है और साथ ही फिश स्पा एवं पेडिक्योर के दौरान एक व्यक्ति के संक्रमण दूसरे तक पहुंचते है। कई मामलों में संक्रमण इतने गंभीर होते हैं कि पैर काटने की नौबत आ जाती है। खास कर वैसे लोगों में जो मधुमेह से पीडित होते हैं। फिश स्पा एवं पेडिक्योर के तहत गर्रा रूफा प्रजाति की मछलियों से हाथों और पैरों की मृत त्वचा की सफाई कराई जाती है। ये मछलियां टर्की से मंगाई जाती हैं। इन मछलियों के दांत नहीं होते, इसलिए स्पा कराने पर दर्द नहीं होता। अब कई पार्लरों एवं ब्यूटी सेंटरों ने घर-घर जाकर भी फिश स्पा देने की सेवा शुरू कर दी है। देश के महानगरों में फिश स्पा कराने वाले सेंटरों की भरमार हो गई है। जहां फिश स्पा एवं पेडिक्योंर करने की फीस ।50 रुपए से लेकर 500 रुपए तक होती है। इन सेंटरों की ओर से दावा किया जाता है फिश-स्पा के बाद त्वचा चिकनी हो जाती है तथा इससे त्वचा संबंधी कई बीमारियों में भी लाभ पहुंचता है। हालांकि इन दावों को अभी तक साबित नहीं किया जा सका है। दूसरी तरफ नए अध्ययनों से पता चला है कि यह कई तरह की बीमारियों को न्यौता देता हैं। यही नहीं यह सामान्य स्क्रब से अधिक असरदार नहीं होता है। FILE फिश स्पा की शुरुआत टर्की में कनगाल नामक स्थान पर गर्म पानी के सोते से हुई, जहां पर वर्ष ।9।7 में एक स्थानीय चरवाहे ने गर्रा रूफा मछली द्वारा चिकित्सकीय लाभ का पता लगाया। कहा जाता है कि गर्रा रूफा मछली डाइर्थाइनोल नामक एन्जाइम उत्सर्जित करती है, जो त्वचा में नया जीवन भरते हैं। लेकिन नए अध्ययनों से पता चलता है कि ये मछलियां संक्रमण एवं बीमारियां फैलाने वाले जीवाणुओं को भी अपने साथ लाती हैं। इनमें से कुछ बैक्टीरिया पर तो एंटीबायोटिक का भी असर नहीं पड़ता है। चिकित्सकों का कहना है कि फिश स्पा एवं पेडिक्योर कराने से एड्स, एचआईवी के चपेट में आने का खतरा हो सकता है, खास तौर पर तब जब आपके पैरों में जख्म हो। डॉ. बांगिया के अनुसार जब मछलियां पैरों एवं हाथों से मृत कोशिकाओं को काटती है। ऐसे में अगर पैरों में जख्म या वे कहीं से कटा हुआ हो तो रक्त बहने लगता है। चूंकि कई महिलाओं या पुरुषों को एक ही टब में स्पा दिया जाता है और इस कारण एड्स तथा एचआईवी जैसे संक्रमणों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं आम तौर पर ज्यादातर सेंटरों में कई-कई दिनों तक स्पा टब का पानी भी नहीं बदला जाता। ऐसे में जब एचआईवी संक्रमित या हेपेटाइटिस-सी के मरीज स्पा में आते हैं और अगर इनके हाथ तथा पांव पर घाव होते हैं, तो मछलियां इन जख्मों को कुरेद देती हैं। कुरेदे गए जख्म से रक्त का रिसाव होता है जो पानी को संक्रमित कर देता है और जब अन्य महिलाएं इस पानी के संपर्क में आती हैं तो उनके विषाणुओं के चपेट में आने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। यही नहीं जिन लोगों को मधुमेह और सोरायसिस जैसी बीमारी हैं, उनके लिए संक्रमण होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इसके अलावा, जिनकी रोग प्रतिरक्षण क्षमता कमजोर है उन्हें फिश स्पा लेने से बचना चाहिए। डॉ. बांगिया का कहना है कि मधुमेह के मरीजों, कम रोग प्रतिरक्षण क्षमता वाले लोगों एवं त्वचा रोगों से पीडि़त लोगों को फिश स्पा कराने से बचना चाहिए। इसके अलावा स्पा के पानी एवं इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को अच्छी तरह से किटाणुमुक्त स्टेरेलाइज किया जाना चाहिए तथा पानी का दोबारा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। फिश स्पा में इस्तेमाल होने वाली मछलियां बेहद महंगी होती हैं इसलिए भारत में कई सेंटरों पर इसी परिवार से संबंधित प्रजाति चिन-चिन या उनसे मिलती-जुलती मछलियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें से कई काटती भी हैं और एक-दूसरे तक यह मछलियां जीवाणुओं एवं विषाणुओं को फैलाती रहती हैं। ज्यादातर सेंटरों में फिश स्पा के पानी की सफाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। इस पानी को साफ एवं जीवाणुओं से मुक्त रखने के लिए फिल्टरेशन, ओजोनाइजर तथा अल्ट्रावायलेट किरणों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा कम ही सेंटरों में होता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बार-बार स्पा एवं पेडिक्योर कराने से अंदर की ओर बढ़ने वाले नाखूनों में समस्या हो सकती है। पेडिक्योर कराने के दौरान नाखूनों की उपरी परत को रगडा़ जाता है, जिससे इसकी ऊपरी परत घिसती है और साथ ही साथ इसकी नमी भी खत्म होने लगती है और नाखून कमजोर हो जाते हैं।
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